सड़ता अनाज

कोई तो खेतों से काकभगोड़ा निकाले,
या दे दाने चिड़िया को,
उस गेहूँ का, उस चावल का,
जो हर साल सड़ता गोदामों में।
या बनता फिर शराब,
परोसा जाता मयखानों में।
कोई तो झोपड़े-फुटपाथों से भूख भगाए.
या दे दाने उन इन्साओं को,
जिन पर है उनका नाम लिखा।

जन्मदिन मुबारक अटलजी

अटलजी को उनके ८८वे जन्मदिवस पर बहुत बहुत शुभकामनाएँ...
ईश्वर उनको दीर्घायु और सुखी एवं स्वास्थवर्धक जीवन प्रदान करें..

अटलजी की कुछ कविताएँ कभी भी पढ़ लो बेहद समसामायिक(relevant) लगती हैं.
जैसे ये:

कौरव कौन, कौन पांडव
 कौरव कौन
 कौन पांडव,
 टेढ़ा सवाल है|
 दोनों ओर शकुनि
 का फैला
 कूटजाल है|
 धर्मराज ने छोड़ी नहीं
 जुए की लत है|
 हर पंचायत में
 पांचाली
 अपमानित है|
 बिना कृष्ण के
 आज
 महाभारत होना है,
 कोई राजा बने,
 रंक को तो रोना है|
-अटल बिहारी वाजपेयी

चाँद और मंगल पर पानी

वो देश, वो लोग खोजते पानी मंगल चाँद पर,
भेजते मशीनी मानव जाने कितने खर्चीले अभियान पर,
आनंद गीत गाते, उत्सव भी मानते,
दिख जाती हिम सदृश सफेदी स्याह चाँद पर,
और कभी अंतरिक्ष  विजय के सपने भी सजोते,
भेजता तस्वीरें नदी की, लोहपुरुष, बैठा जो मंगल यान पर।

वो देश भेजते क्यों नहीं कुछ मानव,
उस स्याह महादुवीप पर,
जहाँ पर जाने के खर्चे होते बस कुछ सिक्कों भर.
जहाँ होती गर्म और भूख की वायु भयंकर,
होता सूरज होता अपने पूर्ण चरम पर।

हाँ! वहाँ होते भी है कुछ  मानव,
कहना है तो कह दो,
संकोच नहीं, हाँ कह दो खुल कर,
हमने देखे हैं भूख से बने जीवित कंकाल,
हाँ!कह दो हमने पा लिया जीवन यहाँ पर,
फिर उस जीवन को सहज बनाने,
करे कुछ अनुप्रयोग, करे कुछ  फिर खर्चे,
 इस गृह के अन्दर उस अपने जैसे गृह  को खोज कर।

रक्षाबंधन

आज है राखी का त्यौहार,
बहिनों की याद आती फिर बार-बार.
पोस्टमैन भैया लाता जब राखी ,
सजती कलाई, होता उसका श्रृंगार.
चाहे दूर-दूर हो फिर भी,
राखी रूप ले आ जाती बहना-
दे जाती खुशियाँ अपार.

क्यों बेचारा हो किसान?

पहले किसानों की जमीन ले लो,
फिर उनके खेतों का पानी, शहर की और मोड़ दो,
और जब वो बोलों उनको गोली दे कर चुप कर दो,
वाह री भारत सरकार, कुछ तो समझ से काम लो.
अगर किसान मरा, या मरी उसकी किसानी,
तो क्या उखाड लोगे,
जब भूखे रोयेंगे राजकुमार तुम्हारे,
क्या सोने के चने चबाओंगे.
http://www.hindustantimes.com/4-farmers-killed-in-police-firing-in-Pune/Article1-731402.aspx

शिक्षा

श्रीमान जब शिक्षा दे
उन्हें.
श्रीमति बोली
फिर उनसे यही,
घेरो न लल्ला को हमारे
नौकरी करनी नहीं.
हे शिक्षे!!!
तुम्हारा नाश हो,
जो तुम नौकरी हित बनी.
मूर्खता!!!
तुम जीती रहो
रक्षक तुम्हारे नेता और धनी.

साक्षी नियति - साक्षी हरिसिंह











पैबन्द लगे कोट पहने,

तांगे पर पहाडिया चढ़कर.

बैरकों से निकाल नव-सांदीपनि निर्माण करते,

हर ईंट-पत्थर-चूने को पसीने से सींचते,

को नियति ने रोक कर पूछा-

हे सरस्वती साधक, लक्ष्मी पालक.

क्या तुम हरिसिंह गौर हो? “

माथे की बूंद को तर्जनी से झटक कर वह बोला-

नहीं, मैं नालंदा का शिल्पी हूँ,  पुनर्जन्म ले यहाँ आ पहुंचा हूँ.

जो भूल वहाँ की थी, यहाँ न दोहराऊंगा,

इस विश्वविद्यालय को अमरत्व-शिल्प से बनाऊंगा.

कई सदियाँ इसको छूकर गुजरेंगी,

और ये बेबाक खड़ा रहेगा.

इसके विद्यार्थी साफल्य-क्षतिज पर चमकेंगे,

जैसे चमकता शिव चंद्र-भाल है.

नियति बोली, मैं साक्षी रहूंगी.  
(१८ जुलाई २०११- आज विश्वविद्यालय ने ६५ साल पूरे किए.)


बस स्टॉप

हम रोज़ बस स्टॉप पर टकराते थे, मुस्कुराने लगे, देख एक दूसरे को। अब टकराते नहीं, मिलने लगे हैं जो रोज़। बेमतलब की बातें शुरू हुई कल से, और, आ...