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बस स्टॉप
हम रोज़ बस स्टॉप पर टकराते थे, मुस्कुराने लगे, देख एक दूसरे को। अब टकराते नहीं, मिलने लगे हैं जो रोज़। बेमतलब की बातें शुरू हुई कल से, और, आ...
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हम रोज़ बस स्टॉप पर टकराते थे, मुस्कुराने लगे, देख एक दूसरे को। अब टकराते नहीं, मिलने लगे हैं जो रोज़। बेमतलब की बातें शुरू हुई कल से, और, आ...
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ये व्यंग १९९५-९८ के दरमियाँ लेखे गए थे, उसके बाद मुझे कंप्यूटर के चूहे ने काट लिया था और मुझे आईटी प्लेग हो गया । आज में उस प्लेग से उबरने ...