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शनिवार, अगस्त 13, 2011

रक्षाबंधन

आज है राखी का त्यौहार,
बहिनों की याद आती फिर बार-बार.
पोस्टमैन भैया लाता जब राखी ,
सजती कलाई, होता उसका श्रृंगार.
चाहे दूर-दूर हो फिर भी,
राखी रूप ले आ जाती बहना-
दे जाती खुशियाँ अपार.

मंगलवार, अगस्त 09, 2011

क्यों बेचारा हो किसान?

पहले किसानों की जमीन ले लो,
फिर उनके खेतों का पानी, शहर की और मोड़ दो,
और जब वो बोलों उनको गोली दे कर चुप कर दो,
वाह री भारत सरकार, कुछ तो समझ से काम लो.
अगर किसान मरा, या मरी उसकी किसानी,
तो क्या उखाड लोगे,
जब भूखे रोयेंगे राजकुमार तुम्हारे,
क्या सोने के चने चबाओंगे.
http://www.hindustantimes.com/4-farmers-killed-in-police-firing-in-Pune/Article1-731402.aspx

गुरुवार, अगस्त 04, 2011

शिक्षा

श्रीमान जब शिक्षा दे
उन्हें.
श्रीमति बोली
फिर उनसे यही,
घेरो न लल्ला को हमारे
नौकरी करनी नहीं.
हे शिक्षे!!!
तुम्हारा नाश हो,
जो तुम नौकरी हित बनी.
मूर्खता!!!
तुम जीती रहो
रक्षक तुम्हारे नेता और धनी.

सोमवार, जुलाई 18, 2011

साक्षी नियति - साक्षी हरिसिंह











पैबन्द लगे कोट पहने,

तांगे पर पहाडिया चढ़कर.

बैरकों से निकाल नव-सांदीपनि निर्माण करते,

हर ईंट-पत्थर-चूने को पसीने से सींचते,

को नियति ने रोक कर पूछा-

हे सरस्वती साधक, लक्ष्मी पालक.

क्या तुम हरिसिंह गौर हो? “

माथे की बूंद को तर्जनी से झटक कर वह बोला-

नहीं, मैं नालंदा का शिल्पी हूँ,  पुनर्जन्म ले यहाँ आ पहुंचा हूँ.

जो भूल वहाँ की थी, यहाँ न दोहराऊंगा,

इस विश्वविद्यालय को अमरत्व-शिल्प से बनाऊंगा.

कई सदियाँ इसको छूकर गुजरेंगी,

और ये बेबाक खड़ा रहेगा.

इसके विद्यार्थी साफल्य-क्षतिज पर चमकेंगे,

जैसे चमकता शिव चंद्र-भाल है.

नियति बोली, मैं साक्षी रहूंगी.  
(१८ जुलाई २०११- आज विश्वविद्यालय ने ६५ साल पूरे किए.)


सोमवार, जुलाई 11, 2011

ट्रेनें

हाँ ट्रेनें, नहीं, नहीं रेलगाड़ी नहीं.
रेलगाड़ी हो तो हो- खोमचे वालों-चाय वालों-अजनबी दोस्तों की.
या फिर हो, घर-प्रियजन-सपनों तक पहुचने की आतुरता सजोते यात्रियों से खचा-खच.

न जाने ये कब ट्रेन में बदल जाती.

जब न्यूज़ चैनलस् वालों को कुछ जल्दी हो, जल्दी से कुछ बताने की.
या फिर अधिकारीयों को अपने प्रवाक्तिक वक्तव्य तैयार करने की.
या फिर रेल मंत्री का अपने इस्तीफा बनाने की.
शायद तब होती होगी-
जब ट्रेन की बातें टीवी पर आने लगे,
और आने लगे नंबर.
रुलाते-भयभीत करने वाले नंबर.

शनिवार, जुलाई 09, 2011

वसुधा का नेता कौन हुआ?(रामधारी सिंह दिनकर)

सच है, विपत्ति जब आती है,
कायर को ही दहलाती है,
शूरमा नहीं विचलित होते,
क्षण एक नहीं धीरज खोते,
विघ्नों को गले लगाते हैं,
काँटों में राह बनाते हैं।

गुरुवार, अप्रैल 28, 2011

न्यू ईस्ट इंडिया कंपनीज़्

भारत में दिख रही हैं, फिर ईस्ट इंडिया कंपनी.
एक नहीं कई सौ, पुणे, बंगलौर, नॉएडा, गुडगाँव, हैदराबाद, कोलकत्ता
मुंबई और धीरे धीरे हर कहीं.
इस बार जो २०० साल नहीं कई सौ साल राज करने आ गई.
और लूटने आई हैं, भारत मन को.
प्राणों को छेदने सोने की सलाखों से.
बेटे-बटियो को दूर करती,
अपने माँ-बाप से.
खेतों से भूमि पुत्रों को,
स्फूर्ति से भरे युवा भारतियों को तोंद लिए;
असमय बृद्ध-मृतक करने.
और भारत में अपने काम के साथ,
भेज रही हैं, अपनी सड़ी-गली-मैली-बदबूदार संस्कृति.
कोई तो गाँधी अब, या फिर कोई मंगल, कोई आज़ाद,
ज्यादा नहीं बस थोड़ी से आंख खोलने को.
और बताने कि न्यू ईस्ट इंडिया कंपनीज़् के अलावा,
और भी जगह है रोटी.

शनिवार, अप्रैल 09, 2011

**समुन्दर**

(याद आई कुछ लाइनें)

१.
प्रलय तिमिर में संयम रख कर, सीख लेते हैं जो हार में जीना.
बिन तरकश तीरों के वो ही चीर देते हैं समुन्दर का सीना.

२.
प्यास कहती है चलो रेत नेचोड़े,
अपने हिस्से में समुन्दर आने वाला नहीं.

सोमवार, मार्च 21, 2011

जापान

जिन नयनं में सपने हो, नींद कहाँ फिर उन नयनं में.
और जब सहसा नयनं में जाती सुनामी, चकरा जाते भू-कंप से.
नयनं में फिर विकृत दृश्य उभरते, जो कुछ पल पहले थे,सौम्य-सुघड.
फिर उन नयन में चैन कहाँ, जब पुनर्निर्माण के सपने हो.
हारने पर, लुट पिट जाने पर भी, जो पौरुष जनशक्ति सामर्थ हो,
लड़कर अपनी बसुधा को जो हर दम बचाए.
अय भोर सूरज देश निवासी तुमको शत्-शत् नमन.

शनिवार, मार्च 05, 2011

बुर्जुआ मोहल्ला

बुर्जुआ मोहल्ला गली के बाहर फिर छटवें दिन मन-मौजा,
घूमा;
रोक न सकूं अपने अंदर के वर्नेकुलर घोड़े को.
हर टाप पर निशान बनाते-बनाते फिर उस दायरे के छोर मिल जाएगा,
सातवें दिन.
बुर्जुआ मोहल्ला में फिर घोड़े को अस्तबल में बंद ये अरबी राह देखेगा,
पांचवे दिन की.
और देखेगा मुझे लम्पन-बुर्जुओं में घुलते-मिलते हुए.

रविवार, जनवरी 23, 2011

आंसूओं का सामान

सरहद के उस पर से,
क्यों हमेशा,
आंसूओं का सामान आता है.
कभी बंदूक-तोप-बमों
के धमाके आते हैं.
और कभी बस चुपचाप
प्याज आ जाता है.

रविवार, अगस्त 22, 2010

पहेलिका


सन्त वचन मुखरित,
मुख मण्डल सुरचित,
वाणी सदा मधु मिश्रित,
कर्म धर्म सदा प्रगटित,
समाज कल्याण हेतु धन संग्रहित.
वायदों के बस्ते,
अनुयायियों के गुलदस्ते,
सुखमय भविष्य के रस्ते,
खादी में ही जचते.
इदम् न संतम्,
इदम् न नायकम्,
इदम् न चारणः,
इदम् न सेवकः,
इदम् नस्तु महानेवचः,
अस्तु इदम् किम्,
बूझत अस्य तम् एव सर्वोच्चः

रविवार, अगस्त 15, 2010

किसकी और कैसी आज़ादी

फिर सुबह टीवी पर दिखा १५ अगस्त.


कैलेन्डर से निकलकर घड़ी से होते हुए, लाल किले पर.

आज सारे टीवी के चैनल दिन भर एक दूसरे को चुनैती देंगे आज़ादी दिखाने के लिए.

घर के बाहर चौराहे के पर उस खम्बे पर तिरंगा लहरा दिया जायेगा,

जिस खम्बे ने परसों रात नशे में डूबी आज़ादी देखी.

लाउडस्पीकरों पर दिन भर "जरा याद करो कुर्बानी" और शाम होते "दर्दे डिस्को".

फिर देश में दिन भर आज़ादी और आज़ादी चलता रहेगा.

commonwealth खेलों के अधूरे stadiums सोचते होंगे,

कि वो भी आज़ाद होंगे, १० सालों से बनते रहने कि गुलामी से.

बेचारी किसान की बेटी अपनी शादी का सपना देख लेती अगर

इस आज़ाद देश की सूखी मिट्टी उसके पिता की नहीं लीलती.

यहाँ आज़ादी है तोड़-फोड की.

खुले आम या कभी फिर टीवी पर अपने बाजुओ को फुला फुला कर- ये

बताने की हम आज़ाद हैं.

कभी धर्म कभी प्रान्त कभी जाति, हर बात करने-कहने की आज़ादी लेकिन मुँह से नहीं.

मेरी उम्र के कई लोग अब यहाँ से भाग जाने की बात करते हैं,

उनको यहाँ आज़ादी कम लग रही या ज्यादा ? पता नहीं??

मगर दूसरे देश की गुलामी और अपने देश का आजदियाँ पर भारी पड़ने लगी हैं.

किसकी और कैसा है ये आज़ादी- पता चले तो बताएगा!!!

गुरुवार, जुलाई 08, 2010

कम्युनिस्ट की फ़ुटबाल

भिनभिनाती वेनेजुला की आवाजों में होते दे दाना-दन गो़ल.
वो पुराने कम्युनिस्ट काफी अच्छा खेलते हैं, छकाई फ़ुटबाल बहुत खूब.

दूसरे वो, बम से उड़ाते रेलें, नचाते निरह मृत्यु नाच.
तोड़ते सैनिकों की घर की चूडियाँ-सपने.
ये कैसी फ़ुटबाल खेल रहे, माओ के नाम पर,
लाशों की भिनभिनाती मक्खियों की हृयविदारक आवाजों में.

ये तो कम्युनिस्ट की फ़ुटबाल नहीं!!!

बस भी करो छकाना सरदारजी-बंगाली बाबू को.
वो अपना दुखी मन मुखोटा ठीक करते रहेंगे, दुखते रहे हैं हम सब.

बुधवार, जून 02, 2010

जिंदगी या जीवन

जिंदगी या जीवन, किसने
जाने इसके ताने-बाने.
कई रंगों के धागे में बुने हैं कैसे ये तो बस ऊपरवाला जाने.

एक धागा है, बचपन का,
इसमें लड़कपन की कहानी है ,
बेफिक्री के रंगों को देखो अजब रवानी है.
बचपन की आँखों में दिखते सवाल है कितने अनजाने.
जिंदगी या जीवन...

दूजा धागा जवानी है, रंग अनोखे दिख लाएगी,
सोने सी है जिसकी सीरत हर पल सहेजी जाएगी.
सपनों और तमन्नाओं के दिखते कैसे बदलते माने,
जिंदगी या जीवन...

तीसरा धागा, बुढापा का, जो आखिर में आता है,
क्या किया – क्या न किया,
क्यों किया – क्यों न किया,
बस इसमें उलझा नज़र आता है.
धागे सारे उधड़ते जायेंगे, हो जायेंगे रंग पुराने,
जिंदगी या जीवन...

शनिवार, मई 01, 2010

भावनाएँ

मैं था मेरी भावनाएँ थी, विकल प्रवाहित,
वही सूरत आम सी अंकित सुन्दर मेरी आँखों में.
सहेजकर रखना चाहूँ हरदम.
भावनाएं उफान पर थी.
क्यों कोई समझे न इन्हें, जब समझ
जाते मेरी तरह सभी.
निभाना है नियति कहते,
निभा लिया इस प्रयास में कभी.
भावनाएं, कोमल कोपल हैं.
कोपलें मुझे-तुझे हम सबको है भाती.
पलाश की मखमली कोपलों ने जीता मेरा सुन्दर आग्रह,
जैसे आज मैंने तुझसे.
कोपलें कोपल न रहती.
मखमली सौम्या अवमंदित पल-पल .
पत्ता बन चिर स्थायी निखार लेती हैं,
जब पत्तों को होना पड़ता आंधी-पानी से हमजोल,
हो जाता तब अनदेखा किए जाने वाला,
त्रस्त टूटता पतझड़ में.
प्रेम सदाबहार बहे हर पल खिलता रहे ,
न मखमली कोपल हो,
न रुखा पत्ता पत्ता,
पतझड़ भी न हो,
भावनाएँ सिकुड़े नहीं ,
विस्तार लेती रहे.

रविवार, अप्रैल 25, 2010

जीवन



जीवन में खुशी मिलें
उसे बांटते चलो,
दुख की लॉरी को
धक्का लगाते गिराते
चलो.
बरसे जब आसमान से बूंदे तो
मन मुस्काता है
जब बूंदे आँखों से बरसती,
मन रोता-चिल्लाता है,
इस मुस्कुराने-रोने-चिल्लाने की रेल चलते चलो.
जीवन में.....
जीवन की हरियाली में पतझड़ के जब पत्ते मिले,
पत्तों के ढेर पर आग लगाओ,
उनके चारों और नाचते गाते चलो.
जीवन में ....

रविवार, अप्रैल 18, 2010

पड़ौसी



ये हवा जो बह के आती है,
तुम्हारे छत से, कुछ सौंधी, कुछ ठंडी सी,
हमारी छतों पे रौनक है भर देती.

अगर बजती जो ढोलक हमारे घर पर,
खनकती चूड़ी जिसकी थाप पर,
कानों में तुम्हारे न्यौते का संदेशा भर है भर देती.

मगर जो बागड है, वो लंबी और इतनी ऊँची,
गर छलांग मैं जो लगाऊं, बस टखनों में जख्म है भर देती.

माना की हम दो अलग झंडों के नीचे बैठे,
जिनमें भरे रंग, नारंगी-हरे-सफ़ेद-नीले,
मगर तेरी धरती भी मेरी धरती के तरह हरी होती,
तेरे नीले आसमान मेरे जैसे,
जिसकी हर शाम है नारंगी रंग भर देती.

है देखो वो उड़ के जा रहे सफ़ेद कबूतर,
न जाने किसने छोड़ें है, तेरी या मेरी तरफ से,
आ जाओ अपनी बागड की उस और हमारी तरह,
कुछ तुम कहो कुछ हम सुनाएँ,
सुना है, बातें प्यारी सी, है दिलों की खाई भर देती.

शुक्रवार, अप्रैल 16, 2010

अखबार उर्फ शोक पत्र

अखबार का कोना फाड़-फेंकते क्यों नहीं ?
शोक पत्र का टोना, भारी जान पड़ता कहीं?

मर-मरे-मारे गए; शोकग्रस्त हर काले अक्षर,
कौन मौन करे बहुत नहीं केवल क्षण भर.

कौन कोना फाड़े जैसे एक मृत्यु-शोकपत्र का फटा था जब,
ठहरो!!!
मृत्यु यहाँ अनकों हैं क्या कोना-कोना कर फाड दोगे अखबार सब?

बुधवार, अप्रैल 14, 2010

ये समय है प्यारे

ये समय है प्यारे, इसे रखना अपने पास,
जिसने गंवाया इसे भुलाया,
उसकी जीने की क्या आस .
ये समय है सोना, इसमें न सोना,
ये समय है धाती जो यही सिखाती,
पढ़लो मुझको, गढ़ ले मुझको,
ले आत्मविश्वास .
ये समय है प्यारे इसे रखना अपने पास ...
इश्वर ने जो जीवन दिया,
उसे ढालना हमको है,
पाठ जगत् से हमने लिया,
उसे उतरना हमको है.
थकने पर भी छोड नहीं देना अनमोल प्रयास .
ये समय है, इसे रखना अपने पास ...
इस समय मार्ग पर चलते कितने जीते युद्द कई,
भारत के अमिट सपूत बने,
समय के पुजारी शिखर्पुत्र सम्राटों की सेना ही थे,
कर्म पूजते बढते जाना रुकना अंतिम श्वास.
ये समय है प्यारे, इसे रखना अपने पास
जिसने गंवाया इसे भुलाया,
उसकी जीने की क्या आस .

शनिवार, मार्च 27, 2010

रूठे देवता चले जा रहे



मैंने ये १३ अक्टूबर १९९९ को लिखा था. इस दिन स्मृतिशेष बाबा त्रिलोचन सागर विश्वविद्यालय(म.प्र.) छोड़ के हरिद्वार रहने जा रहे थे. जहाँ उन्होंने अपना अंतिम शेष जीवन व्यतीत किया. उस समय बाबा सागर विश्वविद्यालय में मुक्तिबोध पीठ के अध्यक्ष थे. मैं अपने को भाग्यशाली मानता हूँ कि मुझे बाबा के पास बैठने का और उनको सुनने का अबसर मिला. ये बड़ी बिडम्बना है की ऐसे महान साहित्य पुरुष की सागर विश्वविद्यालय ने उनके बहाँ रहते उचित महत्ता नहीं समझी, मुझे इस बात को ले कर सागर विश्वविद्यालय पर आज तक तरस आता है, और शोक भी की मैं बाबा को मना नहीं सका कुछ दिन और सागर में रहने को.

******* रूठे देवता चले जा रहे  ********

रूठे देवता चले जा रहे,
सजल नयन हमें छोड़े जा रहे.
सुलभ-अमूल्य-स्नेह से वंचित करके,
शिखर सीढियाँ छोड़े जा रहे,
रूठे देवता चले जा रहे.

यहाँ न अब घड़ियाल बजेंगे,
गूंजेगी यहाँ न अब चौपाई,
रसिको के न थार भरेंगे,
सिसक उठेगी मुई विदाई.
कलम हमारी नास्तिक कर के,
निपट अनाथ छोड़े जा रहे,
रूठे देवता चले जा रहे.

मैं रोऊ, पुरुषोत्तम रोये, निगमजी हीडें,
अश्रु-अक्षत आंचमन करे ललित सर,
खाली कमरे , दीवारें रोएं, आम रोए बेर रोए
और रोए वो टूटी छत.
हरियाली मरुस्थल करके,
जरेंटा सा हमें छोड़े जा रहे,
रूठे देवता चले जा रहे.

गीता सा सन्देश सुनाने कहाँ मिलेंगे वासुदेव सारथी,
मनाऊं कैसे अबूझा हूँ,
या प्रस्तुत स्वयं को करके त्रिलोचन को दूं भस्म आरती.
मानें  भी तो मानें कैसे,
मस्तक देने पड़ें एक-एक कर.
काहे को हमें अब छोड़े जा रहे,
रूठे देवता चले जा रहे.
 





शनिवार, मार्च 20, 2010

जरुरी चीजें


हर समय ध्यान नहीं होती जरुरी चीजें,
कभी आलस,
कभी वेपरवाही,
और कभी भुलने के कारण
खो भी जाती हैं जरुरी चीजें .
फिर शुरू होता खुद को संभालना,
फिर से सिखाना-समझाना,
अगले आलस-वेपरवाह-भुलावे
और जरुरी चीजों को
फिर खोने तक. 

मंगलवार, मार्च 16, 2010

सत्यान्वेषी

सत्य की तलाश में लिए चला लालटेन कौन.
जंगल अंनत काली छाया असत्य की,
धर्म के सूरज की किरणें भ्रष्ट खगों ने कैद की,
उलटे अनीति के चमगादड़ विलग मार्ग सुझाए,
सिलवटी कपाल ले सत्य खोजता है वो मौन,
सत्य की तलाश में लिए चला लालटेन कौन.

प्रतिध्वनि की आशा है, झूठी,
मेला यहाँ अशिक्षा के सियारों का,
मजबूरियों की झाडियाँ हैं ऊँची,
चुक चला भरोसा शासन के कुल्हड़ों का.
सत्य को पैसे ने न खाया हो,
न नोंची हो न्यायविदों ने उसको कोमल खाल,
इसी कोमल पदचाप छोड बढा जाता वोह मौन,
सत्य की तलाश में लिए चला लालटेन कौन.

शनिवार, मार्च 13, 2010

बरसातें होती है बाढ पर,

बरसातें  होती है बाढ पर,
सूखी जमीन रोती है रात भर्।
रात लम्बी तो लम्बी सही,
सुबह वियाबान पर अब होती नही।

पपीहा-किसान-नई नवेली दुल्हन,
स्वाति की बून्द जितनी प्यास भर,
दरारो से अन्कुर की तलाश पर।
पिया मिलन का सावन आएगा नही,
सुखा रो रहा; उबलते पानी मे,
चार दाने दाल के है, है तो सही।

रोटी की महक कहा मचान पर,
कोने मे पडा बिजुका रो रहा आन्ख पर।
चिरैया इधर उड आओ, चुग जायो मुझे ही सही।
बैठी बिटिया चुप डयोढी पर,
काला बादल सपनो मे दुल्हा बनता रात भर,
भले पगडन्डीया छिप गई हो सही,
सपने हमारे अभी रीते नही।

गैया-बैल की दिखने लगी केवल हडडीया भर,
आन्खे फ़िर भी रहती उनकी आसमान पर।
क्यो बाबा, हमारी तरह कुआ रोता क्यो नही,
आन्सू से जिसके बुझा ले प्यास अपनी सही।

टेडीबीयर

फैले दो हाथ हैं, पैर चौड़े,
गुडिया का भालु, सुनो लो कुछ बोले.
पहले पा लो परिचय इसका,
फिर कर लेना इससे बात.
रुई का बना है मेरा मस्त गोल-मटोल,
कपडे एक दम राजसी, आंखे बटन से झोलम-झोल.
कहता है कि गर तुम हो सच्चे,
तो सुन लो बच्चे-कच्चे.
मेरी कोई जात नहीं,
न तो मेरी कोई सीमाएँ हैं.
नहीं कोई कौम मेरा,
न तो कोई नाजी भंगिमाएं हैं.
बस दोस्त जाता, हाथों में आ कर.
इसलिए गर कहता है, तुमसे बनना जग के प्यारे,
पहन लो मेरा नवज्ञान की टोपी जिसमें लगे भाई-चारे के तारे .
हो जाओगे सबसे बढकर,
दोंगे उन भाड मालिकों को मात.
जिनके व्योपार इंसानी चनो को फोड़ना,
और करना देश तोड़ने की बात.

बुधवार, मार्च 10, 2010

आक्रोश

देता है झिडकी, कभी डराता
अपनी बातों से,
उसे करने को कोई काम नहीं
बस फैलाता भय.
अपने अस्त्तित्व की अनदेखी से बुरी तरह डरा अपने
अहम् को तुष्ट कर
अट्टहासों से अन्तर्मन से उठती
भिबत्स चोखों को दबाते-दबाते थक जाता है.
सताते हुए उसकी भंगिमाएं
तब पुन्रानंद में उमडती.
सताया गया और सताने वाले के मध्य यही
निरंतर चलता .
जब तक आता नहीं मध्यस्तता करता आक्रोश.

रविवार, मार्च 07, 2010

--फुटबॉल—

हवा खा कर मोटी हो गयी,
मेरी सुकड़ी फुटबॉल नई.
आओ दोस्तों खेले इससे,
तुम किक्क मारो हम हेड करें;
तुम फॉरवर्ड तू डिफेन्स में;
तुम सेंटर फारवर्ड हम गोली बनें.
फुटबॉल को नाचए,
दौडें मस्ती में हमारी टोली .
गोल जब हो जाये दन्न से
मस्ती में हल्ला बोलें सब के सब.
कभी टांग में अडके कोई गिर जायेगा,
पर उठकर जो आगे खेलेगा,
वही कैप्टेन-सरदार हो जायेगा.

शनिवार, मार्च 06, 2010

-----मेरे सुख दुख---

-----मेरे सुख दुख---
मै सोचता ज्यादा हू,
इसलिए कुछ भावुक हू, या भावुक हू इसलिए सोचता हू।
भावनाए, दुख-सुख सोते नही, चाहे आन्खे बन्द भी हो।
विषय अनुराग है, सरस है विषयो की सुलभता सोचना लगा फ़िर दिन प्रति,
सुख मे कोमल तरन्गो से मन प्रफ़ुलित,
दुख के ताड से विलोडित होता।
समता के अभाव मे सुख से दुख और दुख से सुख को खोजता फ़िरता।

शुक्रवार, जनवरी 01, 2010

***** हरी क्रांति ****

पेड़ न कटे, न वाहन उगलें धुआँ यही कामना है मेरी नववर्ष में साथियों,
न कही मिसाइल गिरे न तेल का सागर बने यही सोच-शांति से आगे बढना होगा साथियों .

धरती से जंगल और पानी नदियों से खो न जाए, प्राकृत सम्पदा से हो जाए खाली हाथ,
बहरे बन कब तक जीना है, इसलिए कान खोल सुन ले ये बात.

पेड़ हमें लगाना हो होगा, वाहन कम चलाना होगा,
ओजोन को शिशु के तरह, पालने में होले से झुलाना होगा.

हो गए ओजोन छेद बड़े बड़े, तो शंकर की तीसरी आंख खोल जाएगी,
एक एसिड की बारिश कम है, प्रचंड अग्नि से पृथ्वी प्रलय में समाएगी .

सो जग लो सब सोये सारे, पृथ्वी को अब हरा-भरा करके दिखलाना है,
ग्रीन हाउस गैस, कार्बन उत्सर्जन और हरित क्रांति क्या है, सब को सिखलाना है .

रविवार, दिसंबर 13, 2009

आईटी प्लेग

ये व्यंग १९९५-९८ के दरमियाँ लेखे गए थे, उसके बाद मुझे कंप्यूटर के चूहे ने काट लिया था और मुझे आईटी प्लेग हो गया । आज में उस प्लेग से उबरने की कोशिश कर रहा हूँ , शुरुआत की है अपने पुराने अख़बारों में प्रकाशित लेखों को यहाँ प्रस्तुत करके ।
आशा करता हूँ कि आप मुझे आईटी प्लेग से उबारने में मेरे सहायक बनेंगे, ताकि मैं हिन्दी देवी के मन्दिर में फ़िर प्रवेश कर सकूं ।
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धन्यवाद्,
नीतेश

बुधवार, दिसंबर 09, 2009

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प्याज का प्यार

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मंगलवार, दिसंबर 08, 2009

कोतवाल भये उम्मीदवार

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शुक्रवार, नवंबर 28, 2008

मुझे माफ़ करना मुंबई

दया प्रेम आवेग तू अंखियाँ गीली मात होने दे,
कसकर पकड़ कृपण तू मुठियाँ ढीली मत होने दे।
जहाँ सस्त्र बल नहीं शास्त्र रोते और पछताते हैं,
ऋषियों को भी मिली सफलता तब से तब ही,
प्रहरे पर जब स्वयं धनुर्धर राम खड़े होते हैं।


[मुझे माफ़ करना मुंबई एक मूकदर्शक बने रहने को]

शनिवार, जुलाई 12, 2008

मेरे पिताजी की कविताओ में से कुछ चार लाइन...

मेरे पिताजी की कविताओ में से कुछ चार लाइन...

जीवन तो एक मकड़जाल है,
आर-पार उलझन ही उलझन.
अगर कहें अटका-भटका मन,
तो तार-तार बुनता चल हे जन.

शुक्रवार, जुलाई 04, 2008

गरीबों की कहानी

गरीबों की कहानी
----------------------
गरीबों की कहानी,
छपकर किताबों में,
बुनकर फिल्मों में,
बिकती है महंगी।
पढ़-देख-सुनकर अमीरों ने जाने है किस्से ;
किस्से भूख, वेबसी, मुफलिसी के।
महसूस करने का स्वांग रचा जाता है वातानुकूलित कमरों में।
अनुभूति जागती फ़िर ।
गरीब पा जाते दया के सिक्के।
सिक्कों के खनक होती किंतु क्षणिक फ़िर नई किताब या फ़िल्म के आने तक।

मंगलवार, जुलाई 01, 2008

काला बादल

काला बादल

______________________

देखो आसमान में कैसा उमड़ आया है काला काला बादल ।

लाल-काली मिट्टी में सोंधी खुश्बू भरने।

रविवार, जून 22, 2008

पहली बूंद

पहली बूंद
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पहली बूंद जैसे तपते तवे पर नाचती मयूरी की तरह,
सुरभित वातावरण जिससे।
किसान खुश ,खेत खुश, सूखे नदी-नाले खुश, जलचर खुश, वनचर खुश;
खुश, पहली बूंद का रूपक बन गया जैसे।
एक पानी के छोटे से भी छोटे गोले में कितनी सम्भावनाये...
अद्भुत।

शनिवार, मई 17, 2008

टेक्नोक्रेट की अभिलाषा

चाह नहीं मैं बन नेता,
इधर से उधर निठल्ले फिरूं ।
चाह नहीं भ्रष्ट सांसद या विधायक बन ,
मीडिया में छा जाऊं, कोर्ट के द्वारे फिरूं ।
चाह नहीं अभिनेता बन कर अंडरवर्ल्ड को ललचाऊ।
चाह नही पुलिस के हत्थे चढूं
वकीलों से बच भाग्य पर इठलाऊँ।

चाह नही भ्रष्टाचारी के समर्थन में में मैं वोट डालूं।
मुझे बैठा लेना ओ एयरलाइन्स वाले; अमेरिका में देना तुम फैंक
बैंक बैलेंस डॉलर में बढ़ने जहाँ जायें टेक्नोक्रेट अनेक।
[26/06/2001]

बुधवार, मई 14, 2008

क्यों है...

कौरव कौंन , पांडव कौंन टेडा सवाल क्यों है।
चारों और फैला शकुनी का कूटजाल क्यों है।
भरी सभा में पंचाली अपमानित है, तो क्यों है।
अगर युद्ध होना ,तो क्यों होना है।
चाहे राजा कोई बने प्रजा को क्यों रोना है।

मंगलवार, मई 13, 2008

जन्मदिन हर साल.



हर साल आती है १३ मई,

और फ़िर हर साल की १२ मई को कुछ गुप्त मंत्रणा करते हैं, मेरे प्रियजन,

मुझे अचंभित करने को.

हर साल नए स्वाद का केक मिलता है फ़िर; गुप्त मंत्रणा का प्रतिफल.

रात में ही घड़ी के कांटे जब मिल जाते तो,

मेरे पूज्य-मेरे इश्वर ; मेरे माँ और पिताजी मुझे आशीष देते.

सुबह फ़िर ईश-वंदना नया जन्म दिवस देख पाने को.

इष्ठ जनों का शुभकामनाएं लेते लेते गुजर जाता सारा दिन.

रात में जोर पकड़ता जश्न का दौर.

फ़िर नींद में खो जाता, जन्मदिवस उत्सव श्रम को दूर करने.

फ़िर एक नई सुबह; मेरा स्वम्भू नया साल शुरु होता,

नई उम्मीदों; नई संभावनाओ; और नए शिखर को पाने को.

फ़िर एक नए जन्मदिन की राह देखता, मैं.....

शनिवार, मई 10, 2008

टूटते हुए लोग

मिल गयी मेरी कवितायों की कॉपी...

******** टूटते हुए लोग******

कुल्हाडों से कटते-कटते,

धडाम से धम्,

देख लिए टूटते लोग ।

जो टूटे नही उनकी कोपलों कों नोच नोच कर,

उनकी वृद्ध जड़ों को डरा डरा धमकाकर,

उनकी संगनी टहनियों कों छांटते हुए,

सूख जाने दिया एक दिन धम्म से टूट कर गिर जाने कों ।

आस-पास की आँखे बस करुणा से देखती रही सब एक अच्छे दर्शक की तरह ।

जिनकी भाग्यरेखा लम्बी रही वे बच गए टूट जाने से आज ।

कल भाग्य कुण्ड के खाली होते खड़े हो जायेंगे कुल्हडे...

उन्हें टूटने को कर देंगे मजबूर ।

रह जाएँगी हमेशा की तरह दर्शक आँखे, और घोर रुदन ।

केवल अटहास भरेगा कुल्हाडा,

साथ देगा उसका *वेंट जो ख़ुद बना है उन पेडों से ।

(*वेंट - कुल्हाडे या किसी औजार को पकड़ने का हत्था )

गुरुवार, मई 08, 2008

मील का वो पत्थर

मील का वो पत्थर
बस में से वो मील का पत्थर देखना
और सोचना की कैसे में समय के एक आयाम से दूसरे में घुस रहा हूँ ।
अभी कभी इस जीवन की गाड़ी में भी मैंने एक ऐसे मील के पत्थर को देखा ।
और अब मैं इस आयाम में खुश नही हूँ।
या फ़िर उस गुजरे आयाम ने मुझे उसके नशे का आदी बनाया दिया था ।
अब नशा उतर रहा है , साथ में जोरों का हँगओवर भी है .

मेरी कवितायों की कॉपी

***** मेरी कवितायों की कॉपी *****
पैसा कमाने की मशीन मैं आज ।
कल जो निश्चिंत लिखा करता था बहुत कुछ उस नवनीत के फुल स्कापे रजिस्टर पर ।
जिससे मैं एक रोजनामचे के मनिद लेख देता था कुछ स्वयं सिद्ध मुक्तक, नई कविता या तुकबंदी।
आज मुझे कुछ लिखने का मन कर रहा है।
गोया मैं निश्चिंत हों फिर से ।
लेकिन पता नही कहाँ खो गई है मेरी कवितायों की कॉपी ।
हो सकता है पूजा वाले कमरे मे रखे बिस्तरपेटी मे पुरानी किताबों और कापियों के साथ हो।
या न जाने माँ ने रद्दी वाले को न दे दी हो मेरी कवितायों की कॉपी ।
खोजना होगा मुझे अपनी कवितायों की कॉपी .
चलो जाता हूँ मै खोजने अपनी कवितायों की कॉपी ।

गुरुवार, जनवरी 25, 2007

‘सदाचार का ताबीज’ - हरिशंकर परसाई

हिंदी Satire को एक नयी परिभाषा देने वाले हरिशंकर परसाई की एक रचना (‘सदाचार का ताबीज’ ) आपके सामने प्रस्तुत है इसका आनंद लिजए....
मुझे आशा है western satires पढ़ने बालों को हिंदी व्यंग्य का गरिमा महत्‍तव मालूम पड़ेगा....


व्यंग्य जीवन से साक्षात्कार करता है- हरिशंकर परसाई
[व्यंग्य क्या होता है? व्यंग्य की सामाजिक भूमिका क्या है तथा आदि प्रश्नों के बारे में परसाई जी ने अपने विचार अक्सर प्रकट किये हैं। १९६२ में अपने व्यंग्य लेखों के संग्रह ‘सदाचार का ताबीज’ की भूमिका लिखते हुये परसाई जी ने इस बारे में विस्तार से लिखा है। यह भूमिका मैं अपने साथियों के लिये यहाँ पेश कर रहा हूँ।]
हरिशंकर परसाई
एक सज्जन अपने मित्र से मेरा परिचय करा रहे थे-यह परसाईजी हैं। बहुत अच्छे लेखक हैं। ही राइट्स फनी थिंग्स।
एक मेरे पाठक(अब मित्रनुमा) मुझे दूर से देखते ही इस तरह हँसी की तिड़तिड़ाहट करके मेरी तरफ बढ़ते हैं,जैसे दिवाली पर बच्चे’तिड़तिड़ी’ को पत्थर पर रगड़कर फेंक देते हैं और वह थोड़ी देर तिड़तिड़ करती उछलती रहती है। पास आकर अपने हाथों में मेरा हाथ ले लेते हैं। मजा आ गया। उन्होंने कभी कोई चीज मेरी पढ़ी होगी। अभी सालों से कोई चीज नहीं पढ़ी ,यह मैं जानता हूँ।
एक सज्जन जब भी सड़क पर मिल जाते हैं,दूर से ही चिल्लाते हैं-’परसाईजी नमस्कार!मेरा पथ-प्रदर्शक पाखाना!’ बात यह है कि किसी दूसरे आदमी ने कई साल पहले स्थानीय साप्ताहिक में एक मजाकिया लेख लिखा था,‘मेरा पथ-प्रदर्शक पाखाना।’ पर उन्होंने ऐसी सारी चीजों के लिये मुझे जिम्मेदार मान लिया है। मैंने भी नहीं बताया कि वह लेख मैंने नहीं लिखा था। बस,वे जहाँ मिलते हैं-’मेरा पथ प्रदर्शक पाखाना कहकर मेरा अभिवादन करते हैं।
कुछ पाठक समझते हैं कि मैं हमेशा उचक्केपन और हल्केपन के मूड में रहता हूँ। वे चिट्ठी में मखौल करने की कोशिश करते हैं!
कुछ पाठक समझते हैं कि मैं हमेशा उचक्केपन और हल्केपन के मूड में रहता हूँ। वे चिट्ठी में मखौल करने की कोशिश करते हैं! एक पत्र मेरे सामने है। लिखा है- कहिये जनाब बरसात का मजा ले रहे हैं न! मेढकों की जलतरंग सुन रहे होंगे। इस पर भी लिख डालिये न कुछ।
बिहार के किसी कस्बे से एक आदमी ने लिखा कि तुमने मेरे मामा का, जो फारेस्ट अफसर है,मजाक उड़ाया है। उसकी बदनामी की है। मैं तुम्हारे खानदान का नाश कर दूँगा। मुझे शनि सिद्ध है।
कुछ लोग इस उम्मीद से मिलने आते हैं कि मैं उन्हें ठिलठिलाता ,कुलाँचे मारता,उछलता मिलूँगा और उनके मिलते ही जो मजाक शुरू करूँगा तो सारा दिन दाँत निकालते गुजार देंगे। मुझे वे गम्भीर और कम बोलने वाला पाते हैं। किसी गम्भीर विषय पर मैं बात छेड़ देता हूँ। वे निराश होते हैं। काफी लोगों का यह मत है कि मैं निहायत मनहूस आदमी हूँ।
एक पाठिका ने एक दिन कहा-आप मनुष्यता की भावना की कहानियाँ क्यों नहींलिखते?
और एक मित्र मुझे उस दिन सलाह दे रहे थे- तुम्हें अब गम्भीर हो जाना चाहिये। इट इज़ हाई टाइम!
व्यंग्य लिखने वाले की ट्रेजिडी कोई एक नहीं हैं। ‘फ़नी’ से लेकर उसे मनुष्यता की भावना से हीन तक समझा जाता है।’मजा आ गया’ से लेकर ‘गम्भीर हो जाओ’ तक की प्रतिक्रयायें उसे सुननी पढ़ती हैं। फिर लोग अपने या अपने मामा,काका के चेहरे देख लेते हैं और दुश्मन बढ़ते जाते हैं। एक बहुत बड़े वयोवृद्ध गाँधी-भक्त साहित्यकार मुझे अनैतिक लेखक समझते हैं। नैतिकता का अर्थ उनके लिये शायद गबद्दूपन होता है।
लेकिन इसके बावजूद ऐसे पाठकों का एक बड़ा वर्ग है,जो व्यंग्य में निहित सामाजिक-राजनीतिक अर्थ संकेत को समझते हैं। वे जब मिलते हैं या लिखते हैं तो मजाक के मूड में नहीं। वे उन स्थितियों की बात करते हैं,जिन पर मैंने व्यंग्य किया है,वे उस रचना के तीखे वाक्य बनाते हैं। वे हालातों के प्रति चिन्तित होते हैं।
आलोचकों की स्थिति कठिनाई की है। गम्भीर कहानियों के बारे में तो वे कह सकते हैं कि संवेदना कैसे पिछलती आ रही है,समस्या कैसे प्रस्तुत की गयी -वगैरह। व्यंग्य के बारे में वह क्या कहे?अक्सर वह कहता है-हिंदी में शिष्ट हास्य का अभाव है।(हम सब हास्य और व्यंग्य के लेखक लिखते-लिखते मर जायेंगे,तब भी लेखकों के बेटे से इन आलोचकों के बेटे कहेंगे कि हिंदी में हास्य -व्यंग्य का अभाव है),हां वे यह और कहते हैं-विद्रूप का उद्‌घाटन कर दिया,परदाफाश कर दिया है,करारी चोट की है,गहरी मार की है, झकझोर दिया है। आलोचक बेचारा और क्या करे?जीवन बोध,व्यंग्यकार की दृष्टि, व्यंग्यकार की आस्था,विश्वास आदि बातें समझ और मेहनत की मांग करती हैं। किसे पड़ी है?
-अच्छा, तो तुम लोग व्यंग्यकार क्या अपने ‘प्राफे़ट’ को समझते हो? ‘फनी’ कहने पर बुरा मानते हो।खुद हँसाते हो और लोग हँसकर कहते हैं-मजा आ गया,तो बुरा मानते हो और कहते हो-सिर्फ मजा आ गया? तुम नहीं जानते कि इस तरह की रचनायें हल्की मानी जाती हैं और दो घड़ी के लिये पढ़ी जाती हैं। [यह बात मैं अपने-आपसे कहता हूँ,अपने-आपसे ही सवाल करता हूँ।]
विसंगति की क्या अहमियत है ,वह जीवन में किस हद तक महत्वपूर्ण है,वह कितनी व्यापक है, उसका प्रभाव कितना है-ये सब बातें विचारणीय हैं। दाँत निकाल देना उतना महत्वपूर्ण नहीं है।
-जवाब: हँसना अच्छी बात है। पकौड़े जैसी नाक को देखकर भी हँसा जाता है,आदमी कुत्ते -जैसे भौंके तो भी लोग हँसते हैं। साइकिल पर डबल सवार गिरें ,तो भी लोग हँसते हैं। संगति के कुछ मान बजे हुये होते हैं- जैसे इतने बड़े शरीर में इतनी बड़ी नाक होनी चाहिये। उससे बड़ी होती है ,तो हँसी आती है। आदमी आदमी की ही बोली बोले,ऐसी संगति मानी हुई है। वह कुत्ते-जैसा भौंके तो यह विसंगति हुई और हंसी का कारण। असामंजस्य,अनुपातहीनता,विसंगति हमारी चेतना को छोड़ देते हैं। तब हँसी भी आ सकती है और हँसी नहीं भी आ सकती-चेतना पर आघात पड़ सकता है। मगर विसंगतियों के भी स्तर होते हैं। आदमी कुत्ते की बोली बोले -यह एक विसंगति है। और वनमहोत्सव का आयोजन करने के लिये पेड़ काटकर साफ किये जायें,जहाँ मन्त्री महोदय गुलाब के ‘वृक्ष’ की कलम रोपें -यह भी एक विसंगति है। दोनों में भेद है,गो दोनों से हँसी आती है। मेरा मतलब है-विसंगति की क्या अहमियत है ,वह जीवन में किस हद तक महत्वपूर्ण है,वह कितनी व्यापक है, उसका प्रभाव कितना है-ये सब बातें विचारणीय हैं। दाँत निकाल देना उतना महत्वपूर्ण नहीं है।
-लेकिन यार,इस बात से क्यों कतराते हो कि इस तरह का साहित्य हल्का ही माना जाता है?-माना जाता है तो मैं क्या करूँ? भारतेन्दु युग में प्रतापनारायण मिश्र और बालमुकुन्द गुप्त जो व्यंग्य लिखते थे ,वह कितनी पीडा़ से लिखा जाता था। देश की दुर्दशा पर वे किसी भी कौम के रहनुमा से ज्यादा रोते थे। हाँ,यह सही है कि इसके बाद रुचि कुछ ऐसी हुई कि हास्य का लेखक विदूषक बनने को मजबूर हुआ । ‘मदारी और डमरू’,'टुनटुन’जैसे पत्र निकले और हास्यरस के कवियों ने ‘चोंच’ और ‘काग’ जैसे उपनाम रखे। याने हास्य के लिये रचनाकार को हास्यास्पद होना पड़ा। अभी भी यही मजबूरी बची है। तभी कुंजबिहारी पाण्डे को ‘कुत्ता’ शब्द आने पर मंच पर भौंककर बताना पड़ता है और काका हाथरसी को अपनी पुस्तक के कवर पर अपना कार्टून छपाना पड़ता है। बात यह है कि हिन्दी-उर्दू की मिश्रित हास्य-व्यंग्य परम्परा कुछ साल चली,जिसने हास्य रस को भडौ़आ बनाया। इसमें बहुत कुछ हल्का है। यह सीधी सामन्ती वर्ग के मनोरंजन की जरूरत से पैदा हुई थी। शौकत थानवी की एक पुस्तक का नाम ही ‘कुतिया’ है। अज़ीमबेग चुग़ताई नौकरानी की लड़की से ‘फ्लर्ट’ करने की तरकीबें बताते हैं! कोई अचरज नहीं कि हास्य-व्यंग्य के लेखकों को लोगों ने हल्के ,गैरजिम्मेदार और हास्यास्पद मान लिया हो।
हमारे समाज में कुचले हुये का उपहास किया जाता है। स्त्री आर्थिक रूप से गुलाम रही ,उसका कोई व्यक्तित्व नहीं बनने दिया गया,वह अशिक्षित रही,ऐसी रही-तब उसकी हीनता का मजाक करना ‘सेफ’ हो गया।
-और ‘पत्नीवाद’ वाला हास्यरस! वह तो स्वस्थ है ? उसमें पारिवारिक-सम्बन्धों की निर्मल आत्मीयता होती है?-स्त्री से मजाक एक बात है और स्त्री का उपहास दूसरी बात। हमारे समाज में कुचले हुये का उपहास किया जाता है। स्त्री आर्थिक रूप से गुलाम रही ,उसका कोई व्यक्तित्व नहीं बनने दिया गया,वह अशिक्षित रही,ऐसी रही-तब उसकी हीनता का मजाक करना ‘सेफ’ हो गया। पत्नी के पक्ष के सब लोग हीन और उपहास के पात्र हो गये-खासकर साला,गो हर आदमी किसी न किसी का साला होता है। इसी तरह घर का नौकर सामन्ती परिवारों में मनोरंजन का माध्यम होता है। उत्तर भारत के सामन्ती परिवारों की परदानशीन दमित रईस-जादियों का मनोरंजन घर के नौकर का उपहास करके होता है। जो जितना मूर्ख , सनकी और पौरुषहीन हो ,वह नौकर उतना ही दिलचस्प होता है। इसलिये सिकन्दर मियाँ चाहे काफी बुद्धिमान हों,मगर जानबूझकर बेवकूफ बन जाते हैं क्योंकि उनका ऐसा होना नौकरी को सुरक्षित रखता है। सलमा सिद्धीकी ने सिकन्दरनामा में ऐसे ही पारिवारिक नौकर की कहानी लिखी है। मैं सोचता हूँ सिकन्दर मियाँ अपनी नजर से उस परिवार की कहानी कहें,तो और अच्छा हो।
-तो क्या पत्नी,साला,नौकर,नौकरानी आदि को हास्य का विषय बनाना अशिष्टता है?-’वल्गर’ है। इतने व्यापक सामाजिक जीवन में इतनी विसंगतियाँ हैं। उन्हें न देखकर बीबी की मूर्खता बयान करना बडी़ संकीर्णता है।
इतने व्यापक सामाजिक जीवन में इतनी विसंगतियाँ हैं। उन्हें न देखकर बीबी की मूर्खता बयान करना बडी़ संकीर्णता है।
-और ‘शिष्ट’ और ‘अशिष्ट’ क्या है?-अक्सर ‘शिष्ट’ हास्य की माँग वे करते हैं,जो शिकार होते हैं। भ्रष्टाचारी तो यही चाहेगा कि आप मुंशी की या साले की मजाक का शिष्ट हास्य करते रहें और उस पर चोट न करें। हमारे यहाँ तो हत्यारे’भ्रष्टाचारी’ पीड़क से भी ‘शिष्टता’ बरतने की माँग की जाती है-’अगर जनाब बुरा न माने तो अर्ज है कि भ्रष्टाचार न किया करें। बड़ी कृपा होगी सेवक पर।’ व्यंग्य में चोट होती ही है। जिन पर होती है वह कहते हैं-’इसमें कटुता आ गयी। शिष्ट हास्य लिखा करिये।’ मार्क ट्वेन की वे रचनायें नये संकलनों में नहीं आतीं,जिनमें उसने अमेरिकी शासन और मोनोपोली के बखिये उधेड़े हैं। वह उसे केवल शिष्ट हास्य का मनोरंजन देने वाला लेखक बताना चाहते हैं- ‘ही डिलाइटेड मिलियन्स’।
इतने मार्क ट्वेन की वे रचनायें नये संकलनों में नहीं आतीं,जिनमें उसने अमेरिकी शासन और मोनोपोली के बखिये उधेड़े हैं। वह उसे केवल शिष्ट हास्य का मनोरंजन देने वाला लेखक बताना चाहते हैं
-तो तुम्हारा मतलब यह है कि मनोरंजन के साथ व्यंग्य में समाज की समीक्षा भी होती है?-हाँ,व्यंग्य जीवन से साक्षात्कार कराता है,जीवन की आलोचना करता है,विसंगतियों, मिथ्याचारों और पाखण्डों का परदाफाश करता है।
-यह नारा हो गया।-नारा नहीं है। मैं यह कह रहा हूँ कि जीवन के प्रति व्यंग्यकार की उतनी ही निष्ठा होती है ,जितनी गम्भीर रचनाकार की- बल्कि ज्यादा ही,वह जीवन के पति दायित्व का अनुभव करता है।
व्यंग्य जीवन से साक्षात्कार कराता है,जीवन की आलोचना करता है,विसंगतियों, मिथ्याचारों और पाखण्डों का परदाफाश करता है।
-लेकिन वह शायद मनुष्य के बारे में आशा खो चुका होता है। निराशावादी हो जाता है। उसे मनुष्य की बुराई ही दीखती है। तुम्हारी रचनाओं में देखो-सब चरित्र बुरे ही हैं।-यह कहना तो इसी तरह हुआ कि डाक्टर से कहा जाये कि तुम रुग्ण मनोवृत्ति के आदमी हो। तुम्हें रोग ही रोग दीखते हैं। मनुष्य के बारे में आशा न होती ,तो हम उसकी कमजिरियों पर क्यों रोते? क्यों उससे कहते कि यार तू जरा कम बेवकूफ ,विवेकशील,सच्चा और न्यायी हो जा।
जिंदगी बहुत जटिल चीज है। इसमें खालिस हँसना या खालिस रोना-जैसी चीज नहीं होती। बहुत सी हास्य रचनाओं में करुणा की अन्तर्धारा होती है।
-तो तुम लोग रोते भी हो। मेरा तो ख्याल था कि तुम सब पर हँसते हो।- जिंदगी बहुत जटिल चीज है। इसमें खालिस हँसना या खालिस रोना-जैसी चीज नहीं होती। बहुत सी हास्य रचनाओं में करुणा की अन्तर्धारा होती है। चेखव की कहानी’ क्लर्क की मौत’ क्या हँसी की कहानी है? उसका व्यंग्य कितना गहरा,ट्रेजिक और करुणामय है। चेखव की ही एक कम प्रसिद्ध कहानी है-’किरायेदार।’ इसका नायक ‘जोरू का गुलाम’ है-बीबी के होटल का प्रबन्ध करता है। अपनी नौकरी छोड़ आया है। अब बीबी का गुलाम उपहास का पात्र होता है न! मगर इस कहानी में यह बीबी का गुलाम अन्त में बड़ी करुणा पैदा करता है। अच्छा व्यंग्य सहानुभूति का सबसे उत्कृष्ट रूप होता है।
अच्छा व्यंग्य सहानुभूति का सबसे उत्कृष्ट रूप होता है।
-अच्छा यार, तुम्हें आत्म-प्रचार का मौका दिया गया था। पर तुम अपना कुछ न कहकर जनरल ही बोलते जा रहे हो। तुम्हारी रचनाओम को पढ़कर कुछ बातें पूछी जा सकती हैं। क्या तुम सुधारक हो?तुममें आर्य समाजी-वृत्ति देखी जाती है।-कोई सुधर जाये तो मुझे क्या एतराज है। वैसे मैं सुधार के लिये नहीं,बदलने के लिये लिखना चाहता हूँ। याने कोशिश करता हूँ-चेतना में हलचल हो जाये,कोई विसंगति नजर के सामने आ जाये।इतना काफी है। सुधरने वाले खुद अपनी चेतना से सुधरते हैं। मेरी एक कहानी है-’सदाचार का तावीज’। इसमें कोई सुधारवादी संकेत नहीं हैं। कुल इतना है कि तावीज बाँधकर आदमी को ईमानदार बनाने की कोशिश की जा रही है,(भाषणों और उपदेशों से)। सदाचार का तावीज बाँधे बाबू दूसरी तारीख को घूस लेने से इंकार कर देता है मगर २९ तारीख को ले लेता है-’उसकी तन्ख्वाह खत्म हो गयी । तावीज बंधा है, मगर जेब खाली है।’ संकेत मैं यह करना चाहता हूँ कि बिना व्यवस्था परिवर्तन किये,भ्रष्टाचार के मौके को खत्म किये और कर्मचारियों को बिना आर्थिक सुरक्षा दिये, भाषणों ,सर्कुलरों, उपदेशों,सदाचार समितियों,निगरानी आयोगों के द्वारा कर्मचारी सदाचारी नहीं होगा। इसमें कोई उपदेश नहीं है। उपदेश का चार्ज वे लोग लगाते हैं, जो किसी के प्रति दायित्व का कोई अनुभव नहीं करते। वह सिर्फ अपने को मनुष्य मानते हैं और सोचते हैं कि हम कीड़ों के बीच रहने को अभिशप्त हैं। यह लोग तो कुत्ते की दुम में पटाखे की लड़ी बाँधकर उसमें आग लगाकर कुत्ते के मृत्यु-भय पर भी ठहाका लगा लेते हैं।
मैं सुधार के लिये नहीं,बदलने के लिये लिखना चाहता हूँ। याने कोशिश करता हूँ-चेतना में हलचल हो जाये,कोई विसंगति नजर के सामने आ जाये।इतना काफी है। सुधरने वाले खुद अपनी चेतना से सुधरते हैं।
-अच्छा यार, बातें तो और भी बहुत -सी करनी थीं। पर पाठक बोर हो जायेंगे। बस एक बात बताओ-तुम इतना राजनीतिक व्यंग्य क्यों लिखते हो?-इसलिये कि राजनीति बहुत बड़ी निर्णायक शक्ति हो गयी है। वह जीवन से बिल्कुल मिली हुई है। वियतनाम की जनता पर बम क्यों बरस रहे हैं? क्या उस जनता की कुछ अपनी जिम्मेदारी है? यह राजनीतिक दाँव-पेंच के बम हैं। शहर में अनाज और तेल पर मुनाफाखोरी कम नहीं हो सकती,क्योंकि व्यापरियों के क्षेत्र से अमुक-अमुक को चुनकर जाना है।राजनीति -सिद्धान्त और व्यवहार की- हमारे जीवन का एक अंग है। उससे नफरत करना बेवकूफी है। राजनीति से लेखक को दूर रखने की बात वही करते हैं,जिनके निहित स्वार्थ हैं,जो डरते हैं कि कहीं लोग हमें समझ न जायें। मैंने पहले भी कहा है कि राजनीति को नकारना भी एक राजनीति है।
राजनीति को नकारना भी एक राजनीति है।
-अच्छा तो बात को यहीं खत्म करें! तुम अब राजनीति पर चर्चा करने लगे । इससे लेबिल चिपकते हैं। -लेबिल का क्या डर! दूसरों को देशद्रोही कहने वाले,पाकिस्तान को भूखे बंगाल का चावल ‘स्मगल’ करते हैं। ये सारे रहस्य मुझे समझ में आते हैं। मुझे डराने की कोशिश मत करो।
-हरिशंकर परसाई १९६२ में प्रकाशित सदाचार का ताबीज से साभार

मंगलवार, जनवरी 23, 2007

कृपया पूरा करॅ...

कुछ प्रयास आपके समक्ष प्रस्‍तुत कर रहा हू.
आशा है, इस धागे को पूरा करेगे.............

बरसातॅ होती है बाढ पर ,
सूखी जमीन रोती है रात भर.

रात काली तो काली सही,
सुबह बियाबा पर होती नही.

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मेरे बारे में

मेरा फोटो
पुणे, MH, India
If you find moody among moodiest, you'll find me standing in the front file & on the sea shore of time on the sliding sand of my mind from the ripples of life. And that ripples is toast with the perfect blend of doing things in different ways. It is not like that I am different from any other, but I have something that differentiate me from the rest of surroundings, additionally integrate me with the characters roaming in my visinity. With that I am fond of moving off the track enjoying the twist in life. I hate stupidity, fake superiority complex, dishonesty, falsehood of any kind and indiscipline. Transparency in my life help me in deviating my energy to convert it into strength rather than keeping life black to look opaque. Being religious help me in getting out of stress and get my biological RAM flash out. Speed is my in-out. You find me fast express speaking man. It is hard to understand me sometimes when I was on peak of my expresso flow of words.