शुक्रवार, नवंबर 28, 2008

मुझे माफ़ करना मुंबई

दया प्रेम आवेग तू अंखियाँ गीली मात होने दे,
कसकर पकड़ कृपण तू मुठियाँ ढीली मत होने दे।
जहाँ सस्त्र बल नहीं शास्त्र रोते और पछताते हैं,
ऋषियों को भी मिली सफलता तब से तब ही,
प्रहरे पर जब स्वयं धनुर्धर राम खड़े होते हैं।


[मुझे माफ़ करना मुंबई एक मूकदर्शक बने रहने को]

शनिवार, जुलाई 12, 2008

मेरे पिताजी की कविताओ में से कुछ चार लाइन...

मेरे पिताजी की कविताओ में से कुछ चार लाइन...

जीवन तो एक मकड़जाल है,
आर-पार उलझन ही उलझन.
अगर कहें अटका-भटका मन,
तो तार-तार बुनता चल हे जन.

शुक्रवार, जुलाई 04, 2008

गरीबों की कहानी

गरीबों की कहानी
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गरीबों की कहानी,
छपकर किताबों में,
बुनकर फिल्मों में,
बिकती है महंगी।
पढ़-देख-सुनकर अमीरों ने जाने है किस्से ;
किस्से भूख, वेबसी, मुफलिसी के।
महसूस करने का स्वांग रचा जाता है वातानुकूलित कमरों में।
अनुभूति जागती फ़िर ।
गरीब पा जाते दया के सिक्के।
सिक्कों के खनक होती किंतु क्षणिक फ़िर नई किताब या फ़िल्म के आने तक।

रविवार, जून 22, 2008

पहली बूंद

पहली बूंद
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पहली बूंद जैसे तपते तवे पर नाचती मयूरी की तरह,
सुरभित वातावरण जिससे।
किसान खुश ,खेत खुश, सूखे नदी-नाले खुश, जलचर खुश, वनचर खुश;
खुश, पहली बूंद का रूपक बन गया जैसे।
एक पानी के छोटे से भी छोटे गोले में कितनी सम्भावनाये...
अद्भुत।

शनिवार, मई 17, 2008

टेक्नोक्रेट की अभिलाषा

चाह नहीं मैं बन नेता,
इधर से उधर निठल्ले फिरूं ।
चाह नहीं भ्रष्ट सांसद या विधायक बन ,
मीडिया में छा जाऊं, कोर्ट के द्वारे फिरूं ।
चाह नहीं अभिनेता बन कर अंडरवर्ल्ड को ललचाऊ।
चाह नही पुलिस के हत्थे चढूं
वकीलों से बच भाग्य पर इठलाऊँ।

चाह नही भ्रष्टाचारी के समर्थन में में मैं वोट डालूं।
मुझे बैठा लेना ओ एयरलाइन्स वाले; अमेरिका में देना तुम फैंक
बैंक बैलेंस डॉलर में बढ़ने जहाँ जायें टेक्नोक्रेट अनेक।
[26/06/2001]

बुधवार, मई 14, 2008

क्यों है...

कौरव कौंन , पांडव कौंन टेडा सवाल क्यों है।
चारों और फैला शकुनी का कूटजाल क्यों है।
भरी सभा में पंचाली अपमानित है, तो क्यों है।
अगर युद्ध होना ,तो क्यों होना है।
चाहे राजा कोई बने प्रजा को क्यों रोना है।

मंगलवार, मई 13, 2008

जन्मदिन हर साल.



हर साल आती है १३ मई,

और फ़िर हर साल की १२ मई को कुछ गुप्त मंत्रणा करते हैं, मेरे प्रियजन,

मुझे अचंभित करने को.

हर साल नए स्वाद का केक मिलता है फ़िर; गुप्त मंत्रणा का प्रतिफल.

रात में ही घड़ी के कांटे जब मिल जाते तो,

मेरे पूज्य-मेरे इश्वर ; मेरे माँ और पिताजी मुझे आशीष देते.

सुबह फ़िर ईश-वंदना नया जन्म दिवस देख पाने को.

इष्ठ जनों का शुभकामनाएं लेते लेते गुजर जाता सारा दिन.

रात में जोर पकड़ता जश्न का दौर.

फ़िर नींद में खो जाता, जन्मदिवस उत्सव श्रम को दूर करने.

फ़िर एक नई सुबह; मेरा स्वम्भू नया साल शुरु होता,

नई उम्मीदों; नई संभावनाओ; और नए शिखर को पाने को.

फ़िर एक नए जन्मदिन की राह देखता, मैं.....