मेरे पिताजी की कविताओ में से कुछ चार लाइन...
जीवन तो एक मकड़जाल है,
आर-पार उलझन ही उलझन.
अगर कहें अटका-भटका मन,
तो तार-तार बुनता चल हे जन.
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