चुप

 वो गौरैया,

मीठा सा चहचहाना जिसका।

फुदकती इधर से उधर,

गर्दन ऊपर कभी नीचे करती,

खोजती जाने क्या क्या।

कभी फुर्र से उड़ जाती,

फिर घंटो बाद आती,

लेकर अपनी चहचहाट और कुछ तिनके,

भर देती मेरे बगीचे को,

अपरिजिता, गुड़हल, गुलमोहर, गेंदे

की पंखुड़ियों से,

बिखर जाते सुरीली सरसराहट से जो।

आज बगीचा है खाली,

हवा थी सरसराहट बिना,

था कुछ नहीं खोजता कोई,

खाली खाली वियावन सा सब।

गौरैया आई, लेकिन चुप सी

बोली सूरज फिर आया,

नदी साथ लेने।

पानी का टोकरा सरकाते,

बोला मैंने, तुम चहचहाओ बस,

पाताल के सीने में,

पानी तेरे लिए,

सूरज से मैंने छुपाया है।


वो

सुलझी सी,

भोली सी,

सुरीली सी,

समझती सी,

परखती सी,

रानी सी,

कर्मठ जो,

निर्भय वो,

पारखी जो,

कलाकार वो,

शांति दे जो,

दुख हर ले वो,

नटखट जो,

गंभीर वो,

आतुर जो,

धीर वो,

हंसी जो,

आंसू वो,

ईश्वर जो,

मां है वो।

पियो चाय अब

१.

एक चुलबुली

श्वेत कार में गाती

हर हाइनेस सी 

२.

दुकान मेरी

शब्दों की बंद सालों

उसने यूं खोली

३.

खंगाले शब्द

धोए निचोड़ के सुखाए 

फूटी कविता

४.

बोली नींद से

जापानी इनेमुरी सी

तुम जाग गए

५.

पतीली मेरी

काव्य की गरमाने

पियो चाय अब



१.
वो नाचा मोर
फुहारते बादल
लो नाव बनाएं?
२.
कागज़ कोरे
मोड़ के नाव बनी
मटकती चली



हे ईश्वर!

कुछ दिनों से जब-जब समाचार पढ़ता हूँ,
रोज सुबह दिल भर आता है.
उत्तराखंड की तस्वीरें और खबरें पढ़ कर.
ये क्या है ईश्वर?
जिन लोगों ने तुमको सदियों से पूजा, विश्वास किया.
उन लोगों के साथ ही विश्वासघात;
तुम मानव कब बन गए पता ही नहीं चला.

बस स्टॉप

हम रोज़ बस स्टॉप पर टकराते थे, मुस्कुराने लगे, देख एक दूसरे को। अब टकराते नहीं, मिलने लगे हैं जो रोज़। बेमतलब की बातें शुरू हुई कल से, और, आ...